Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 22

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् |
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् || 22||

यत्-जो; तु-लेकिन; कृत्स्नवत्-जैसे कि वह पूर्ण सम्मिलित हो; एकस्मिन्–एक; कार्ये कार्य; सक्तम्-तल्लीन; अहैतुकम्-अकारण; अतत्त्व-अर्थ-वत्-जो सत्य पर आधारित न हो; अल्पम्-अणु अंश; च-और; तत्-वह; तामसम्-तमोगुणी; उदाहृतम्-कहा जाता है।

Translation

BG 18.22: वह ज्ञान जिसमें मनुष्य ऐसी धारणा रखता है मानो वह संपूर्ण के सदृश हो और जो ज्ञान न तो किसी कारण या सत्य पर आधारित है उसे तामसिक ज्ञान कहते हैं।

Commentary

जब बुद्धि तमोगुण के प्रभाव से कुंठित हो जाती है तब यह निकृष्ट अवधारणा में इस प्रकार से निष्ठ हो जाती है जैसे कि वही पूर्ण सत्य है। ऐसी विचारधारा के कारण लोग प्रायः कटट्रवादी बन जाते हैं और जो वे समझते हैं उसे ही सत्य मानने लगते हैं। उनका ज्ञान न तो तर्कसंगत और न ही शास्त्रों या सत्य पर आधारित होता है। किन्तु फिर भी वे अपने विचारों को दूसरों पर थोपना चाहते हैं। मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसे अनेक उन्मादियों को देखा गया है जो स्वयं को भगवान का संदेशवाहक, अनुयायी और उनके विधान का रक्षक बनने का ढोंग करते रहे हैं। वे दूसरों को धर्म परिवर्तन के लिए फुसलाते हैं और अपने समान मति वाले अनुयायी ढूंढ लेते हैं। इस प्रकार से वे 'एक अंधा दूसरे अंधे को मार्ग दिखाने' वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। तथापि भगवान और धर्म की सेवा के नाम पर वे समाज में विघटन उत्पन्न करते हैं और भाईचारे की भावना में बाधा उत्पन्न करते हैं।

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
18. मोक्ष संन्यास योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!