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Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 5

यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् |
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् || 5||

यज्ञ-यज्ञ, दान-दान; तपः-तपः कर्म-कर्म; न कभी नहीं; त्याज्यम्-त्यागने चाहिए। कार्यम्-एव निश्चित रूप से संपन्न करना चाहिए; तत्-उसे; यज्ञः-यज्ञ; दानम्-दान; तपः-तप; च-और; एव-वास्तव में; पावनानि-शुद्ध करने वाले; मनीषिणाम् ज्ञानियों के लिए भी।

Translation

BG 18.5: यज्ञ, दान, तथा तपस्या का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें निश्चित रूप से सम्पन्न करना चाहिए। यज्ञ, दान तथा तपस्या महात्माओं को भी शुद्ध करते हैं।

Commentary

यहाँ पर श्रीकृष्ण निष्कर्ष सुनाते हुए कहते हैं कि हमें उन कार्यो का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए जो हमें उन्नत करते हैं और मानव जाति के लिए लाभप्रद होते हैं। ऐसे कार्य अगर समुचित चेतना में संपन्न किए जाये तब ये हमें कर्म बंधन में नहीं डालते, अपितु हमें आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करते हैं। यह समझने के लिए हम एक (कैटरपिलर) का उदाहरण लेते हैं। अपनी काया-पलट करने के लिए वह एक कोश (ककुन) बुनता है और वह स्वयं को इसमें बंद कर लेता है। बाद में जब वह तितली बन जाता है तब वह कोश को भेदकर आकाश में उड़ जाता है। इस संसार में हमारी स्थिति भी ऐसी है। उस कैटरपिलर के समान हम वर्तमान में इस संसार में आसक्त हैं और सदगुणों से वंचित है। अपने उत्थान हेतु हमें इस प्रकार के कार्यों को सम्पन्न करना चाहिए जो हमारे भीतर आंतरिक परिवर्तन कर सकें। यज्ञ, दान और तप कर्म भी ऐसे ही कार्य हैं। कभी-कभी ये कर्म बंधन में डालने वाले भी प्रतीत होते हैं, लेकिन ये कैटरपिलर के कोश के समान हैं। ये हमारी अशुद्धता को नष्ट कर हमें भीतर से पवित्र बनाते हैं तथा इस भौतिक संसार के चक्र को तोड़ने में सहायता करते हैं। अतः श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह उपदेश देते हैं कि इस प्रकार के कार्यों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए। अपितु उचित मनोवृत्ति के साथ हमें इनका निष्पादन करना चाहिए।

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