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Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 8, Verse 16

आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन |
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते || 16||

आ-ब्रह्म-भुवनात्-ब्रह्मा के लोक तक; लोकाः-सारे लोक; पुनः-फिर; आवर्तिनः-पुर्नजन्म लेने वाले; अर्जुन-अर्जुन; माम्-मुझको; उपेत्य-पाकर; तु-लेकिन; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र अर्जुनः पुनः जन्म-पुनर्जन्म; न कभी नहीं; विद्यते-होता है।

Translation

BG 8.16: हे अर्जुन! इस भौतिक सृष्टि के सभी लोकों में ब्रह्मा के उच्च लोक तक जाकर भी तुम्हें पुनर्जन्म प्राप्त होगा। हे कुन्ती पुत्र! परन्तु मेरा धाम प्राप्त करने पर फिर आगे पुनर्जन्म नहीं होता।

Commentary

 

वैदिक ग्रंथों में पृथ्वी लोक से नीचे सात लोकों-तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल,और पाताल के अस्तित्व का वर्णन किया गया है। इन सबको नरक या नरक लोक कहा जाता है। पृथ्वी लोक से आरम्भ होकर इसके उपर सात लोक-भूः, भूव:, स्व:, मह:, जनः, तपः, और सत्य: लोक अस्तित्व में हैं। इन सबको 'स्वर्ग' या 'देवलोक' भी कहा जाता है। अन्य धार्मिक परंपराओं में भी सात स्वर्गों का वर्णन मिलता है। यहूदी धर्म के तलमुड ग्रंथ में अराबोथ नाम के उच्च लोक सहित सात स्वर्गों का उल्लेख किया गया है (सॉल्म-68.4)। इस्लाम में भी सात स्वर्ग लोकों का उल्लेख किया गया है जिसमें 'सातवाँ आसमान' की गणना सबसे उच्च लोक के रूप में की गई है। सृष्टि में भिन्न-भिन्न ग्रह जिनका अस्तिव है, उन्हें विभिन्न लोक कहा गया है। हमारे भौतिक ब्रह्माण्ड में 14 लोक हैं। इसमें सबसे उच्चतम ब्रह्मा का लोक है जिसे ब्रह्मलोक कहा जाता है। इन सभी लोकों में माया का प्रभुत्व रहता है। इन लोकों के निवासी जन्म-मृत्यु के चक्र के अधीन होते हैं। श्रीकृष्ण ने पिछले श्लोक में इन्हें 'दुःखालयम् और अशाश्वतम्' अस्थायी एवं दुखों से भरा कहा है। यहाँ तक कि स्वर्ग के राजा की भी एक दिन मृत्यु होती है। पुराणों में वर्णन है कि एक बार इन्द्र ने देवलोक के अभियन्ता विश्वकर्मा को भव्य महल का निर्माण करने का कार्य सौंपा। इस महल के निर्माण का कार्य पूर्ण नहीं हो रहा था इसलिए थक-हार कर विश्वकर्मा ने भगवान से सहायता करने की प्रार्थना की। भगवान ने वहाँ प्रकट होकर इन्द्र से पूछा कि इस भव्य महल के निर्माण में कितने विश्वकर्मा लगाए गए हैं। इन्द्र ने चकित होकर इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा-"मेरे विचार से केवल एक ही विश्वकर्मा है।" भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा-"इस ब्रह्माण्ड सहित ऐसे 14 लोक हैं और सृष्टि में अनन्त ब्रह्माण्ड हैं और सभी में एक इन्द्र और एक विश्वकर्मा हैं।" 

तत्पश्चात् इन्द्र ने उसकी ओर बढ़ती हुई चीटियों की पंक्ति देखी। वह आश्चर्यचकित होकर कहने लगा कि इतनी बड़ी संख्या में चीटियाँ कहाँ से आई। भगवान ने कहा-मैंने उन सब आत्माओं को बुलाया है जो पूर्वजन्म में इन्द्र थी और ये सब अब चींटियों के शरीर में हैं। इन्द्र उनकी विशाल संख्या देखकर चकित हो गया। कुछ समय पश्चात् वहाँ पर लोमश ऋषि प्रकट हुए। उन्होंने अपने सिर पर चटाई रखी हुई थी और उनके वक्ष स्थल पर बालों का एक चक्र था। उस चक्र से कुछ बाल गिरे हुए थे जिससे चक्र में कहीं-कहीं रिक्त स्थान दिखाई दे रहा था। इन्द्र ने ऋषि का स्वागत किया और उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा-" श्रीमान् आपने सिर पर पूस की चटाई क्यों रखी हुई है और आपके वक्ष पर बालों का चक्र होने का क्या अभिप्राय है?" लोमश ऋषि ने उत्तर देते हुए कहा-"मुझे चिरायु होने का वरदान प्राप्त है। इस ब्रह्माण्ड में एक इन्द्र का कार्यकाल पूरा होने पर एक बाल टूटकर गिर जाता है। जिससे इस चक्र में रिक्त स्थान दिखाई देते हैं। मेरे शिष्य मेरे रहने के लिए घर का निर्माण करना चाहते थे परन्तु मैने विचार किया कि जीवन अस्थायी है तब फिर यहाँ घर क्यों बनाया जाए? मैं फूस की चटाई अपने पास रखता हूँ जो मुझे वर्षा व धूप से बचाती है। रात्रि के समय मैं इसे पृथ्वी पर बिछाकर सो जाता हूँ।" इन्द्र यह सोचकर अचंभित हुआ, “इस ऋषि का जीवनकाल कई इन्द्रों की आयु है और फिर भी यह कह रहा है कि जीवन अस्थायी है। तब फिर मैं ऐसे भव्य महल का निर्माण क्यों कर रहा हूँ?" उसका घमंड चूर-चूर हो गया और उसने विश्वकर्मा को महल बनाने के कार्य से मुक्त कर दिया।

 इन कथाओं को पढ़ते हुए हमें भगवद्गीता के ब्रह्माण्डीय विज्ञान की अद्भुत अंत:दृष्टि युक्त चमत्कार की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। निकोलस कॉपरनिकस पहले पश्चिम वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक उपयुक्त सिद्धांत स्थापित करते हुए कहा कि वास्तव में सूर्य ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। उससे पहले पश्चिम जगत यह विश्वास करता था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र थी। तत्पश्चात् खगोल विज्ञान में हुई प्रगति से ज्ञात हुआ कि सूर्य भी ब्रह्माण्ड का केन्द्र नहीं है बल्कि यह तो आकाशगंगा के चारों ओर भ्रमण करता है। विज्ञान में आगे हुई प्रगति से वैज्ञानिक यह जानने में समर्थ हुए कि हमारी आकाश गंगा के समान कई अन्य आकाशगंगायें है और इनमें से प्रत्येक में हमारे लोक के सूर्य के समान असंख्य तारे होते हैं। इसके विपरीत पाँच हजार वर्ष पूर्व वैदिक दर्शन में वर्णन किया गया है कि पृथ्वी भूर्लोक है, जो स्वर्लोक के चारों ओर घूर्णन करती है। इनके बीच के क्षेत्र को भुव: लोक कहा गया है। किन्तु स्वर्लोक भी स्थिर नहीं है यह जनलोक के गुरुत्व में स्थित है और इनके बीच के क्षेत्र को महर लोक कहा जाता है किन्तु जनलोक भी स्थिर नहीं है। यह ब्रह्मलोक (सत्यलोक) के चारों ओर घूर्णन कर रहा है और इनके बीच के क्षेत्र को तपलोक कहा जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि सात उच्चलोक और समान रूप से सात निम्नलोक हैं। इस प्रकार पाँच सहस्त्र वर्ष पूर्व प्रकट किया गया  यह ज्ञान अत्यन्त अद्भुत है। 

श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि ब्रह्माण्ड के सभी 14 लोकों में माया का आधिपत्य है। इसलिए यहाँ के निवासी जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसे रहते हैं। किन्तु जो भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं, वे माया के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और मृत्यु होने पर भौतिक शरीर को त्याग कर वे भगवान का परमधाम प्राप्त करते हैं। उन्हें दिव्य शरीर प्राप्त होता है जिससे वे नित्य भगवान की दिव्य लीलाओं में भाग लेते हैं। इस प्रकार से वे इस मायाबद्ध भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेते। कुछ संत माया से मुक्ति पाने के पश्चात् भी लौटकर संसार में आते हैं किन्तु वे अन्य लोगों को उसी प्रकार से माया के बंधनों से मुक्त करवाने हेतु संसार में अवतरित होते हैं। ये सब महान अवतारी होते हैं जो मानवता के कल्याण में लगे रहते हैं।

 

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