श्रीभगवानुवाच |
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त: |
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा: || 32||
श्रीभगवान्-उवाच-भगवान ने कहा; काल:-काल; अस्मि-मैं हूँ; लोक-क्षय-कृत्-लोकों का नाश करने वाला; प्रवद्ध:-शक्तिमान काल; लोकान्–समस्त लोकों का; समाहर्तुम्-संहार करने वाला; इह-इस संसार में; प्रवृत्तः-लगा हुआ; ते–बिना; अपि-भी; त्वाम्-आपको; न-कभी नहीं; भविष्यन्ति–मारे जाना; सर्वे सभी; ये-जो; अवस्थिताः-व्यूह रचना में खड़े; प्रति-अनीकेषु-विपक्षी सेना के; योधाः-सैनिक।
BG 11.32: परम प्रभु ने कहा-“मैं प्रलय का मूलकारण और महाकाल हूँ। मैं जगत का संहार करने के लिए आता हूँ। तुम्हारे युद्ध में भाग नहीं लेने पर भी युद्ध में खड़े विरोधी पक्ष के योद्धा मारे जाएंगे।"
श्रीभगवानुवाच |
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त: |
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा: || 32||
परम प्रभु ने कहा-“मैं प्रलय का मूलकारण और महाकाल हूँ। मैं जगत का संहार करने के लिए आता हूँ। तुम्हारे …
Sign in to save your favorite verses.
Sign InStart your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!
अर्जुन के प्रश्न ‘कि वे कौन हैं?' की प्रतिक्रिया में श्रीकृष्ण सर्वशक्तिशाली काल और ब्रह्माण्ड के विनाशक के रूप में अपना स्वरूप प्रकट करते हैं। 'काल' शब्द की उत्पत्ति 'कलयति' से हुई है जिसका सामानार्थी शब्द गणयति है। इसका अर्थ है "काल का स्मरण करते रहे हैं।" सृष्टि की सभी घटनाएँ काल के गर्भ में समा जाती है।
'ओपन हाइमर' जो प्रथम एटम बम बनाने में अग्रिम सदस्य थे और हिरोशिमा और नागासाकी के ध्वंस के साक्षी थे, उन्होंने श्रीकृष्ण के इस श्लोक उद्धृत किया है-'काल' रूप-मैं समस्त जगत का विनाशक हूँ। काल सभी जीवों के जीवन की गणना और उसे नियंत्रित करता है। वही यह निश्चित करेगा कि कब भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महानुभावों के जीवन का अन्त होगा। यह अर्जुन के युद्ध में भाग न लेने के बावजूद भी शत्रु सेना का विनाश कर देगा क्योंकि भगवान की संसार निर्माण की योजना के अनुसार ऐसा होना सभाविक है।
यदि योद्धा पहले से ही मरे हुए हैं तब फिर अर्जुन युद्ध क्यों लड़े? श्रीकृष्ण इसे अगले श्लोक में स्पष्ट करेंगे।