Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 14, Verse 19

नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति |
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति || 19||

न–नहीं; अन्यम्-अन्य; गुणेभ्यः-गुणों के कर्तारम्-कर्म के कर्त्ता; यदा-जब; द्रष्टा देखने वाला; अनुपश्यति-ठीक से देखता है; गुणेभ्यः-प्रकृति के गुणों से; च-तथा; परम्-दिव्य; वेत्ति–जानता है; मत्-भावम् मेरी दिव्य प्रकृति को; सः-वह; अधिगच्छति–प्राप्त करता है।

Translation

BG 14.19: जब बुद्धिमान व्यक्ति को यह ज्ञात हो जाता है कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई अन्य कर्ता नहीं है और जो मुझे इन तीन गुणों से परे देखते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करता है।

Commentary

श्रीकृष्ण त्रिगुणों के बंधनों को काटने का सरल समाधान प्रस्तुत करते हैं। संसार के सभी जीव इन तीनों गुणों के चुंगल में फंसे रहते हैं और इसलिए ये गुण ही सभी कार्यों के वास्तविक कर्ता हैं। लेकिन सर्वशक्तिमान भगवान इनसे परे हैं। इसलिए उन्हें त्रिगुणातीत अर्थात् माया के तीन गुणों से परे कहा जाता है। इस प्रकार से भगवान की सभी विशेषताएँ उनके नाम, गुण, लीलाएँ और संत भी गुणातीत होते हैं। यदि हम अपने मन को इन तीन गुणों से युक्त किसी व्यक्ति या पदार्थ में आसक्त करते हैं, तब उसका परिणाम उनके गुणों के अनुसार हमारे मन और बुद्धि पर पड़ता है। लेकिन यदि हम अपने मन को दिव्य क्षेत्र में अनुरक्त करते हैं तब वह गुणातीत होकर दिव्य बन जाता है। वे जो इस सिद्धांत को समझते हैं वे सांसारिक पदार्थों और लोगों के साथ अपनी आसक्ति और संबंधों को शिथिल करना आरम्भ कर देते हैं और अपने संबंधों को भगवान और गुरु में दृढ़ करते हैं। इससे वे गुणातीत होने में समर्थ हो जाते हैं और भगवान की दिव्य प्रकृति को पाते हैं। इसे आगे श्लोक 14.26 में विस्तार से समझाया गया है।

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
14. गुण त्रय विभाग योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!