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Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 16, Verse 12

आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: |
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्जयान् || 12||

आशा-पाश–इच्छाओं रूपी बन्धन; शतैः-सैकड़ों द्वारा; बद्धाः-बँधे हुए; काम-वासना; क्रोध -क्रोधः परायणाः-समर्पित होकर; ईहन्ते प्रयास करते हैं; काम-वासना; भोग-इन्द्रिय-तृप्ति; अर्थम् के लिए; अन्यायेन-अवैध रूप से; अर्थ-धन; सञ्चयान्–संचय करना।

Translation

BG 16.12: सैंकड़ों कामनाओं के बंधनों में पड़ कर काम वासना और क्रोध से प्रेरित होकर वे अवैध ढंग से धन का संग्रह करने में जुटे रहते हैं। यह सब वे इन्द्रिय तृप्ति के लिए करते हैं।

Commentary

संसार में धन आनन्द प्राप्त करने का साधन है इसलिए भौतिकवादी लोग जो कामनाओं द्वारा प्रेरित होते हैं वे अपने जीवन में धन संग्रह करने को प्राथमिकता देते हैं। वे धन अर्जन के लिए अवैद्य तरीकों को अपनाने में भी संकोच नहीं करते। इसलिए उनके अनैतिक आचरण के लिए दोहरा दण्ड निर्धारित है। श्रीमद्भागवतम् में वर्णन किया गया है

यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्। 

अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ।।

(श्रीमद्भागवतम्-7.14.8) 

"कोई भी व्यक्ति उतना हि धन रखने का अधिकारी है जितना उसकी उदरपूर्ति के लिए पर्याप्त है और शेष उसे धन पुण्य कार्यों के लिए दान करना चाहिए। यदि कोई अपनी आवश्यकताओं से अधिक धन का संग्रह करता है, तब वह भगवान की दृष्टि में चोर कहलाता है और इसके लिए उसे दण्ड भोगना पड़ता है। यह दण्ड क्या होगा?" सर्वप्रथम तो मृत्यु के समय उसके द्वारा अर्जित की गई धन संपत्ति उसके साथ नहीं जाएगी। यह उससे छीन ली जाएगी। पुनः कर्मों के विधान के अनुसार धन अर्जन करने के लिए किए गए पापों के लिए भी दंड भोगना पड़ेगा। जब कोई तस्कर पकड़ा जाता है तब केवल उसका सामान ही जब्त नहीं किया जाता है बल्कि कानून का उल्लंघन करने के लिए उसे दण्ड भी दिया जाता है।

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