य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: |
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || 23||
यः-जो; शास्त्र-विधिम्-शास्त्रों की आज्ञाओं को; उत्सृज्य-त्याग कर; वर्तते-करते हैं; कामकारतः-इच्छा के आवेग से प्रेरित होकर; न-न तो; सः-वे; सिद्धिम् पूर्णतः को; अवाप्नोति–प्राप्त करते हैं; न कभी नहीं; सुखम्-सुख; न कभी नहीं; पराम्-सर्वोच्च; गतिम्-लक्ष्य।
BG 16.23: वे जो इच्छाओं के आवेग से कर्म करते हैं और शास्त्रों के विधि-निषेधों को नहीं मानते वे न तो सिद्धि प्राप्त करते हैं और न ही परम लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: |
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || 23||
वे जो इच्छाओं के आवेग से कर्म करते हैं और शास्त्रों के विधि-निषेधों को नहीं मानते वे न तो सिद्धि …
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शास्त्र मानव को आत्मज्ञान की यात्रा के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं। वे हमें ज्ञान और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें यह उपदेश देते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। यह निर्देश दो प्रकार के होते हैं जिन्हें विधि और निषेध कहा जाता है। कर्मों का पालन करने संबंधी निर्देशों को विधि कहा जाता है। कर्मों का अनुपालन न करने संबंधी निर्देशों को निषेध कहा जाता है। इन दोनों प्रकार की आज्ञाओं का निष्ठापूर्वक पालन करने से मनुष्य परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। किन्तु आसुरी प्रकृति के मनुष्यों का मार्ग शास्त्रों के उपदेशों के विपरीत होता है। वे निषिद्ध कर्मों में संलग्न रहते हैं और विहित कर्मों से दूर रहते हैं।
ऐसे लोगों का उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि जो वास्तविक मार्ग का त्याग करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं वे अपनी इच्छाओं के आवेगों द्वारा प्रेरित होते हैं, और वे न तो सच्चा ज्ञान और न ही पूर्ण आनन्द तथा न ही माया के बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।