कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 47 ||
कर्मणि-निर्धारित कर्म में; एव केवल; अधिकारः-अधिकार; ते तुम्हारा; मा-नहीं; फलेषु कर्मफल में; कदाचन-किसी भी समय; मा कभी नहीं; कर्म-फल-कर्म के परिणामस्वरूप फल; हेतुः-कारण; भू:-होना; मा-नहीं; ते तुम्हारी; सङ्गः-आसक्ति; अस्तु-हो; अकर्मणि-अकर्मा रहने में।
BG 2.47: तुम्हें अपने निश्चित कर्मों का पालन करने का अधिकार है लेकिन अपने कर्मों के फल में तुम्हारा अधिकार नहीं हे, तुम स्वयं को अपने कर्मों के फलों का कारण मत मानो और न ही अकर्म रहने में आसक्ति रखो।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 47 ||
तुम्हें अपने निश्चित कर्मों का पालन करने का अधिकार है लेकिन अपने कर्मों के फल में तुम्हारा अधिकार नहीं हे, …
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यह भगवद्गीता का अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है और भारतीय विद्यालयों के अधिकतम छात्र इस श्लोक से भली-भांति परिचित हैं। यह कार्य को निष्काम भाव से करने की प्रेरणा प्रदान करता है और प्रायः कर्म योग के विषय पर चर्चा के दौरान इसका उल्लेख किया जाता है।
इस श्लोक में कर्मयोग के संबंध में चार उपदेश दिए गए हैं-(1) तुम अपना कर्म करो लेकिन इसके फल की चिन्ता न करो, (2) तुम्हारे कर्म का फल तुम्हारे सुख के लिए नहीं है अर्थात् तुम अपने कर्मों के फल के भोक्ता नहीं हो, (3) कर्म करते समय कर्ता होने का अहंकार न करो, (4) अकर्मण्य रहने में आसक्ति न रखो।
कर्म करो परन्तु फल की चिन्ता न करोः हमें अपना कर्म करने का अधिकार है लेकिन इसका फल हमारे प्रयासों पर निर्भर नहीं है। परिणाम के निर्धारण या सुनिश्चितता में हमारे प्रयत्न, भाग्य अर्थात् हमारे पूर्वकर्म, भगवान की इच्छा, अन्य लोगों के प्रयास, संबद्ध मनुष्यों के संयुक्त कर्म, स्थान और परिस्थितियाँ आदि अनेक प्रकार के तत्त्वों की भूमिका होती है। फिर भी हम परिणाम के लिए चिन्तित होते हैं और जब हमें ये हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं मिलते तब हम दुःखी हो जाते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को फल की चिन्ता करने के स्थान पर केवल शुभ कर्म करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करने का उपदेश देते हैं। वास्तव में जब हम परिणाम की चिन्ता नहीं करते तब हम अपने प्रयासों पर पूरा ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं जिसके परिणाम पहले से अधिक उत्तम होते हैं। इसके लिए सूत्र उक्ति एन.ए.टी.ओ. 'नेटो' (नॉट अटैच्ड टू ऑउटकम) जिसका अर्थ है-परिणाम के प्रति आसक्ति का न होना। इसे दैनिक कर्म के समान समझना चाहिए जैसे कि गोल्फ खेलना। जब हम गोल्फ खेलते हैं तब उसके परिणाम में रुचि नहीं लेते हैं चाहे उनका स्कोर कम या अधिक क्यों न हो। यदि हम केवल अपनी क्षमता के अनुसार अपना शॉट खेलने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तब हमें प्रतीत होगा कि गोल्फ अत्यंत रोमांचक खेल है जिसे हमने पहले कभी इस प्रकार से नहीं खेला। इसके अतिरिक्त यदि वे खेले जाने वाले शॉट पर पूरा ध्यान केन्द्रित करते हैं तब वे अपने खेल को और ऊंचाईयों तक ले जाएंगे।
कर्मों का फल हमारे सुख के लिए नहीं है- कर्म करना मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। संसार में जन्म लेने पर हमारी पारिवारिक परिस्थिति, सामाजिक स्थिति और व्यवसाय आदि के अनुसार हमें विभिन्न प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। कर्मों का निष्पादन करते समय हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम इनके फलों के भोक्ता नहीं हैं बल्कि इनके फल भगवान के सुख के निमित्त हैं। मनुष्य भगवान का अणु अंश है (श्लोक 15.7) और हमारा यह अन्तर्निष्ठ स्वभाव है कि हम अपने सभी कर्मों द्वारा भगवान की सेवा करें।
दासभूतमिदं तस्य जगत्स्थावजंगमम्।
श्रीमन्नारायणः स्वामी जगतां प्रभुरीश्वरः।।
(पद्म पुराण)
"भगवान संपूर्ण सृष्टि के परम स्वामी हैं; सभी चर अचर प्राणी उनके सेवक हैं।" निम्नवर्णित विचारों से सांसारिक चेतना का प्राकट्य होता है-“मैं उन सब सभी वस्तुओं का जो मेरे अधिकार में हैं, का स्वामी हूँ! यह सारे पदार्थ मेरे सुख के लिए हैं। मुझे अपनी पद, प्रतिष्ठा और अपने सुख-ऐश्वर्य को बढ़ाने का पूरा अधिकार है।" इसके विपरीत आध्यात्मिक चेतना है जो इस प्रकार के विचारों का स्फुरण करती है-“भगवान ही संसार के सभी सुख ऐश्वर्य के स्वामी हैं और मैं उनका निष्काम सेवक हूँ। मुझे अपना सर्वस्व जो मेरे अधिकार में है, भगवान की सेवा में अर्पित करना चाहिए।" इसी प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह स्वयं को अपने कर्मों के फलों का भोक्ता न समझें।
कर्म करते समय कर्ता होने का अहंकार न करनाः श्रीकृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन कृताभिमान अर्थात् स्वयं को कर्त्ता मानने के अभिमान का त्याग कर दे। वे अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह अपने कर्मों से संबद्ध पूर्वकल्पित उद्धेश्यों का अनुसरण न करे और न ही स्वयं को अपने कार्यों के परिणाम का कारण माने। लेकिन जब हम कर्म करते हैं तब हम स्वयं को उन कर्मों का कर्ता क्यों न मानें? इसका कारण यह है कि हमारी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जड़ हैं। भगवान इन्हें शक्ति प्रदान करते हैं और इन्हें हमारे संज्ञान पर छोड़ देते हैं जिसके फलस्वरूप हम कर्म करने में समर्थ होते हैं।
उदाहरणार्थ रसोई घर मे पड़े चिमटे अपने आप में निष्क्रिय हैं किन्तु वे किसी के हाथ में आते ही क्रियाशील हो जाते हैं और तब वे जलते हुए कोयले को उठाने आदि जैसे कठिन से कठिन कार्य भी कर लेते हैं। फिर भी यदि हम चिमटों को अपने कार्यों का कर्ता कहते हैं तब यह अनुचित होगा। यदि हमारे हाथ उन्हें क्रियाशील नहीं बनाते तब वे क्या कुछ करने में समर्थ होते? वे केवल टेबल पर पड़ी जड़ वस्तु होते।
समान रूप से यदि भगवान हमें शरीर, मन, और आत्मा युक्त इस तंत्र को कर्म करने की शक्ति प्रदान न करते, तब हम कुछ भी नहीं कर सकते थे। इसलिए हमें कर्ता होने के अभिमान का त्याग करना होगा और यह स्मरण रखना होगा कि भगवान ही केवल उन शक्तियों के एक मात्र स्रोत हैं जिनके द्वारा हम कर्म करते हैं। उपर्युक्त प्रकार के विचारों का सुन्दर वर्णन निम्न वर्णित प्रसिद्ध संस्कृत के श्लोक में मिलता है।
यत्कृतं यत्करिष्यामि तत्सर्वं न मयाकृतम्।
त्वया कृत तु फलभुक् त्वमेव मधुसूदन ।।
"जो भी मैंने प्राप्त कर लिया है और जो भी प्राप्त करना चाहता हूँ उनका कर्ता मैं नहीं हूँ। हे मधुसूदन! आप ही वास्तविक कर्ता हो और आप ही सभी फलों के स्वयं भोक्ता हो।"
अकर्मण्यता के प्रति आसक्त न होनाः यद्यपि कर्म करना सभी मनुष्यों का स्वभाव है किन्तु प्रायः ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जब कार्य करना बोझिल और कठिन लगता है। ऐसी स्थिति में उससे बचने के स्थान पर हमें श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए कर्मयोग के दिव्य ज्ञान के अनुसार उस कार्य को सम्पन्न करना चाहिए। किन्तु यह सरासर अनुचित होगा यदि हम कार्य को दुष्कर और बोझिल मानकर अकर्मा बन जायें। निष्क्रियता के प्रति आसक्ति होने से कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता और भगवान श्रीकृष्ण इसकी स्पष्ट रूप से निंदा करते हैं।