Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 1

श्रीभगवानुवाच |
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् |
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् || 1||

श्रीभगवान् उवाच-परम भगवान श्रीकृष्ण ने कहा; इमम् इस; विवस्वते-सूर्यदेव को; योगम्-योग शास्त्र में प्रोक्तवान्-उपदेश दिया; अहम्-मैंने; अव्ययम्-शाश्वत; विवस्वान्-सूर्यदेव का नाम: मनवे-मनु को; प्राह-दिया; मनुः-मनु; इक्ष्वाकवे-सूर्यवंश के प्रथम राजा इक्ष्वाकु; अब्रवीत्-उपदेश दिया।

Translation

BG 4.1: परम भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-मैने इस शाश्वत ज्ञानयोग का उपदेश सूर्यदेव, विवस्वान् को दिया और विवस्वान् ने मनु और फिर इसके बाद मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।

Commentary

किसी मनुष्य को केवल ज्ञान प्रदान करना ही पर्याप्त नहीं होता। ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए उसकी महत्ता समझना और उसकी प्रामाणिकता पर विश्वास करना आवश्यक होता है। तभी वे अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से इसका क्रियान्वयन करने का प्रयास करेंगे। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिए जा रहे आध्यात्मिक ज्ञान की विश्वसनीयता और महत्व को प्रतिपादित किया है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उसे युद्ध करने की प्रेरणा प्रदान करने हेतु दिया जा रहा ज्ञान कोई नवीन ज्ञान नहीं है। यह वही शाश्वत ज्ञान योग है जिसका उपदेश उन्होंने सबसे पहले विवस्वान् या सूर्यदेव को दिया था और फिर सूर्य देवता ने इस ज्ञान का उपदेश सृष्टि के प्रथम मानव मनु को और फिर बाद में मनु ने इसे सूर्य वंशज के पहले राजा इक्ष्वाकु को दिया। इसे अधोगामी ज्ञान पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति में ज्ञानी व्यक्ति इस ज्ञान को अन्य व्यक्ति को प्रदान करता है।

 इसके विपरीत उध्वगामी ज्ञान पद्धति है जिसमें कोई व्यक्ति अपने प्रयासों द्वारा ज्ञान को बढ़ाता है। यह स्व-अर्जित प्रक्रिया श्रम साध्य, अपूर्ण और अधिक समय लेने वाली होती है। उदाहरणार्थ हम भौतिक शास्त्र सीखना चाहते हैं। हम या तो स्व-अर्जित पद्धति से इसे सीखने का प्रयास करते हैं जिसके लिए हमें अपनी पूरी बुद्धि लगते हैं और फिर बाद में किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं या फिर अधोगामी पद्धति का आश्रय लेते हैं और इस विषय में निपुण अध्यापक से संपर्क करते हैं। स्व अर्जित पद्धति अत्यधिक समय लेती है और हम अपने जीवन काल में पूर्ण ज्ञान भी नहीं प्राप्त कर पाते। हम अपने निष्कर्षों की सटीकता के प्रति आश्वस्त भी नहीं हो सकते। किंतु अन्य पद्धति द्वारा हम शीघ्र ही भौतिक शास्त्र के गूढ़ रहस्यों को जान सकते हैं। यदि हमारे अध्यापक को भौतिक विज्ञान का पूर्ण ज्ञान है तब हम उससे इस विज्ञान को सुगमता से ग्रहण कर सकते हैं। ज्ञान की यह पद्धति सरल और दोष रहित है। 

प्रत्येक वर्ष हजारों ऐसी पुस्तकें बाजार में आती हैं जिनके लेखक जीवन की सामान्य समस्याओं का हल भी उसमें प्रस्तुत करते हैं। ये पुस्तकें एक सीमा तक सहायक होती हैं क्योंकि ये ज्ञान प्राप्त करने की स्व अर्जित पद्धति पर आधारित होती हैं इसलिए ये अपूर्ण होती हैं। कुछ वर्षों पश्चात् नए सिद्धान्त स्थापित होते हैं जो वर्तमान सिद्धान्त को खंडित कर देते हैं। यह स्व अर्जित पद्धति परम सत्य का बोध कराने में अनुपयुक्त होती है। दिव्य ज्ञान को प्रकट करने के लिए निजी प्रयत्नों की आवश्यकता नहीं होती। यह भगवान की शक्ति है। यह तब से अस्तित्त्व में हैं जब से भगवान हैं। जैसे गर्मी और प्रकाश उतने ही पुराने हैं जितनी कि अग्नि जिससे ये प्रकट होते हैं। भगवान और जीवात्मा दोनों सनातन हैं और इसलिए भगवान और आत्मा को एकीकृत करने वाला योग विज्ञान भी शाश्वत है। अतः इसके लिए नये सिद्धान्त की कल्पना और रचना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसकी साक्षात् उदाहरण स्वयं भगवद्गीता है जो अपनी ज्ञान की विलक्षणता के द्वारा लोगों को विस्मित करती है और जो आज से 50वीं शताब्दी पहले सुनायी जाने के बावजूद वर्तमान में भी हमारे दैनिक जीवन के लिए प्रासंगिक है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि योग का जो ज्ञान वे अर्जुन को दे रहे हैं वह शाश्वत और प्राचीन काल से गुरु-शिष्य परम्परा द्वारा एक-दूसरे तक पहुँचता रहा है।

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
4. ज्ञान कर्म संन्यास योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!