युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु |
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा || 17||
युक्त-सामान्य; आहार-भोजन ग्रहण करना; विहारस्य–मनोरंजन; युक्त-चेष्टस्य-कर्मसु कार्यों में संतुलन; युक्त-संयमित; स्वप्न-अवबोधस्य–सुप्त और जागरण अवस्था; योगः-योगः भवति–होता है; दु:ख-हा-कष्टों का विनाश करने वाला।
BG 6.17: लेकिन जो आहार और आमोद-प्रमोद को संयमित रखते हैं, कर्म को संतुलित रखते हैं और निद्रा पर नियंत्रण रखते हैं, वे योग का अभ्यास कर अपने दु:खों को कम कर सकते हैं।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु |
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा || 17||
लेकिन जो आहार और आमोद-प्रमोद को संयमित रखते हैं, कर्म को संतुलित रखते हैं और निद्रा पर नियंत्रण रखते हैं, …
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योग भगवान के साथ आत्मा का मिलन है। इसके विपरीत भोग का आशय इन्द्रिय सुख में लिप्त होना है। भोग में संलिप्तता शरीर के स्वाभाविक नियमों के विपरीत है और इसके परिणामस्वरूप रोग पनपते हैं। पिछले श्लोक में किए गए वर्णन के अनुसार यदि शरीर रोगग्रस्त हो जाता है तब योग के अभ्यास में बाधा उत्पन्न होती है। इसलिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है कि शारीरिक गतिविधियों को संयमित कर योग के अभ्यास द्वारा हम शारीरिक और मानसिक दु:खों से मुक्त हो सकते हैं।
श्रीकृष्ण के पच्चीस सौ वर्षों के पश्चात् गौतम बुद्ध ने भी यही उपदेश दिया। उन्होंने कठोर तप और कामुक भोग के बीच मध्यम मार्ग का पालन करने की अनुशंसा की। इस संबंध में एक रोचक कथा इस प्रकार से है-
ऐसा कहा जाता है कि ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व गौतम बुद्ध एक बार अन्न और जल का त्याग कर ध्यान में लीन हो गये। इस प्रकार कुछ दिनों की साधना के अभ्यास के पश्चात् वे दुर्बल हो गये और उन्हें चक्कर आने लगे तब उन्हें आभास हुआ कि मन को साधना में स्थिर रखना असंभव है। उसी समय कुछ ग्रामीण महिलाएँ वहाँ से निकल रही थीं। उन्होंने जल से भरा मटका अपने सिर पर रखा हुआ था जिन्हें वे समीप की नदी से भरकर ला रही थीं और गीत गा रही थीं। उस गीत के स्वर इस प्रकार के थे-"तानपुरे के तारों को कस कर रखो किन्तु इतना भी न कसो कि वे टूट जाए।" उनके शब्द गौतम बुद्ध के कानों में पड़े तब वे अचम्भित होकर बोले, 'ये अनपढ़ ग्रामीण महिलाएँ ऐसे ज्ञान के शब्द गा रही हैं। उनका संदेश हम मनुष्यों के लिए है कि हमें भी अपने शरीर रूपी तानपुरे को कस कर रखना चाहिए किन्तु इतना भी न कसें कि शरीर ही नष्ट हो जाए।'
बैंजामिन फ्रैंकलिन (1706-1790) संयुक्त राज्य अमेरिका के संस्थापकों में से एक, ने अपने चरित्र का विकास करने के लिए बीस वर्ष की आयु में डायरी लिखना आरम्भ किया था जिसमें उन्होंने तेरह कार्यों का उल्लेख किया जिनमें वे उन्नति करना चाहते थे। उनकी पहली प्रतिज्ञा थी खान-पान संतुलित करो ताकि सुस्ती न आए और अधिक मदिरा पान न करो।