Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 20

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता: |
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता: स्वया || 20||

कामैः-भौतिक कामनाओं द्वारा; तैः-तैः-विविध; हृत-ज्ञाना:-जिनका ज्ञान हर लिया गया है; प्रपद्यन्ते–शरण लेते हैं; अन्य-अन्य; देवताः-स्वर्ग के देवताओं की; तम्-तम्-अपनी-अपनी; नियमम् नियम; आस्थाय-पालन करना; प्रकृत्या स्वभाव से; नियता:-नियंत्रित; स्वया अपने आप।

Translation

BG 7.20: वे मनुष्य जिनकी बुद्धि भौतिक कामनाओं द्वारा हर ली गयी है, वे देवताओं की शरण में जाते हैं। अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार वे देवताओं की पूजा करते हैं और इन देवताओं को संतुष्ट करने के लिए वे धार्मिक कर्मकाण्डों में संलग्न रहते हैं।

Commentary

जब भगवान श्रीकृष्ण सभी अस्तित्वों के आधार हैं तब कोई भी देवता अपने आप में स्वतंत्र नहीं हो सकता। जैसे किसी देश का राष्ट्रपति देश की शासन व्यवस्था का संचालन कई अधिकारियों की सहायता से करता है उसी प्रकार से देवता भी भगवान के शासन के अधिकारी हैं। हमारे जैसी जीवात्माएँ जोकि आध्यात्मिक रूप से समुन्नत हैं, वे अपने पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों के परिणामस्वरूप भौतिक जगत की शासन व्यवस्था में उच्च पद प्राप्त कर लेती हैं। वे किसी को माया के बंधनों से मुक्ति नहीं दिला सकतीं क्योंकि वे अपने आप में स्वतंत्र नहीं हैं। वे केवल अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर की भौतिक वस्तुएँ प्रदान कर सकती हैं। लौकिक कामनाओं की पूर्ति हेतु लोग देवताओं की पूजा करते हैं और उनकी पूजा के लिए निश्चित धार्मिक विधियों का पालन करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोग जिनका ज्ञान भौतिक इच्छाओं से आच्छादित हो जाता है वही देवताओं की पूजा करते हैं।

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
7. ज्ञान विज्ञान योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!